अर्जुन मेहताVIEW PROFILE →
यूपीआई से इंडिया स्टैक तक: कैसे भारत अपनी डिजिटल क्रांति को पूरी दुनिया में निर्यात कर रहा है
हर साल अरबों लेन-देन और दुनिया के लगभग आधे रियल-टाइम डिजिटल भुगतान के साथ, भारत का यूपीआई अब एक वैश्विक मॉडल बन चुका है। आधार, डिजिलॉकर और ओएनडीसी के साथ मिलकर 'इंडिया स्टैक' अब दर्जनों देशों तक पहुँच रहा है। यह भारत की नई डिजिटल कूटनीति की कहानी है।
आज भारत में सब्ज़ी वाले के ठेले से लेकर बड़े शॉपिंग मॉल तक, हर जगह भुगतान का एक ही तरीका सबसे आम हो गया है—यूपीआई यानी यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस। यह सिर्फ़ एक भुगतान ऐप नहीं, बल्कि एक ऐसी क्रांति है जिसने देश में पैसे के लेन-देन के तरीके को हमेशा के लिए बदल दिया है और अब यह पूरी दुनिया का ध्यान खींच रही है।
इसकी सफलता के आँकड़े हैरान करने वाले हैं। साल भर में यूपीआई के ज़रिए अरबों की संख्या में लेन-देन होते हैं, जिससे यह दुनिया की सबसे बड़ी रियल-टाइम भुगतान प्रणालियों में से एक बन गया है। एक अनुमान के अनुसार, दुनिया भर में होने वाले तत्काल डिजिटल भुगतानों में अकेले भारत की हिस्सेदारी लगभग आधी तक पहुँच चुकी है।
लेकिन यूपीआई इस कहानी का सिर्फ़ एक हिस्सा है। यह भारत के उस बड़े ढाँचे का केंद्र है जिसे 'इंडिया स्टैक' कहा जाता है। इसमें डिजिटल पहचान देने वाला आधार, दस्तावेज़ रखने वाला डिजिलॉकर और ऑनलाइन व्यापार के लिए बना ओएनडीसी जैसे हिस्से शामिल हैं, जो मिलकर एक संपूर्ण डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढाँचा तैयार करते हैं।
सीमाओं के पार बढ़ता कदम

इस डिजिटल ढाँचे की असली ताक़त अब सीमाओं के पार दिखाई दे रही है। यूपीआई अब भारत तक सीमित नहीं रहा और इसे कई देशों की भुगतान प्रणालियों से जोड़ा जा चुका है। सिंगापुर, संयुक्त अरब अमीरात, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, मॉरीशस, फ्रांस और क़तर जैसे देशों में यह पहले से ही किसी न किसी रूप में काम कर रहा है।
सीमा पार होने वाले लेन-देन की रफ़्तार भी तेज़ी से बढ़ी है। एक वित्तीय वर्ष में यह संख्या कुछ हज़ार से बढ़कर लाखों तक पहुँच गई, यानी महज़ एक साल में कई गुना का उछाल। इससे विदेशों में रहने वाले भारतीयों के लिए पैसा भेजना और पर्यटकों के लिए भुगतान करना पहले से कहीं ज़्यादा आसान और सस्ता हो गया है।
एक नई डिजिटल कूटनीति
भारत अब केवल अपनी तकनीक इस्तेमाल ही नहीं कर रहा, बल्कि उसे दूसरे देशों को एक मॉडल के रूप में पेश कर रहा है। रिपोर्टों के अनुसार, भारत ने दो दर्जन के क़रीब देशों के साथ डिजिटल सार्वजनिक ढाँचे और इंडिया स्टैक को अपनाने के लिए समझौते किए हैं, जिनमें अफ़्रीका, कैरिबियन और एशिया के कई देश शामिल हैं।
यह एक तरह की नई डिजिटल कूटनीति है, जिसे कई लोग भारत की 'सॉफ्ट पावर' का विस्तार मानते हैं। जो देश विकसित नहीं हैं और जिनके पास महँगे निजी समाधान ख़रीदने के साधन नहीं हैं, उनके लिए भारत का यह खुला और अपेक्षाकृत सस्ता मॉडल एक आकर्षक विकल्प बनकर उभरा है, जो बड़ी विदेशी कंपनियों पर निर्भरता घटाता है।
इसका सबसे बड़ा महत्व समावेशन यानी सबको साथ लेकर चलने में है। इस ढाँचे ने भारत में करोड़ों लोगों को, जो कभी बैंकिंग व्यवस्था से बाहर थे, औपचारिक अर्थव्यवस्था से जोड़ा है। सरकारी सहायता सीधे लोगों के खातों में पहुँचाना और छोटे कारोबारियों को डिजिटल भुगतान से जोड़ना इसी की देन है।
चुनौतियाँ और सवाल
हालाँकि, इस चमकदार तस्वीर के अपने अँधेरे पहलू भी हैं जिन्हें नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। सबसे बड़ी चिंता निजता और डेटा सुरक्षा की है। जब करोड़ों लोगों की पहचान और लेन-देन का डेटा एक ही व्यवस्था से जुड़ा हो, तो उसके दुरुपयोग या सेंधमारी का ख़तरा भी उतना ही गंभीर हो जाता है।
इसके अलावा डिजिटल खाई का सवाल भी बना हुआ है। जिन लोगों के पास स्मार्टफोन या इंटरनेट की अच्छी सुविधा नहीं है, या जो तकनीक से सहज नहीं हैं, ख़ासकर बुज़ुर्ग और दूरदराज़ के इलाक़ों के लोग, वे कहीं इस डिजिटल दौड़ में पीछे न छूट जाएँ, इसका ध्यान रखना बेहद ज़रूरी है।
फिर भी, इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत का डिजिटल सार्वजनिक ढाँचा दुनिया के लिए एक मिसाल बन चुका है। इसने साबित किया है कि तकनीक का इस्तेमाल केवल मुनाफ़े के लिए नहीं, बल्कि आम जनता के जीवन को आसान बनाने के लिए भी किया जा सकता है। यदि निजता और समावेशन की चुनौतियों को सुलझा लिया जाए, तो यह मॉडल कई देशों का भविष्य बदल सकता है।






