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भारत बना अर्धचालक निर्माण का नया केंद्र, माइक्रोन और टाटा के कारखाने शुरू

tech2026-08-20 · 4 min read · 174 reads

भारत में अर्धचालक यानी सेमीकंडक्टर का निर्माण तेजी से आगे बढ़ रहा है। माइक्रोन और टाटा जैसी कंपनियों के कारखाने शुरू हो चुके हैं, जबकि ढोलेरा में पहला फैब्रिकेशन प्लांट बन रहा है।

भारत तेजी से अर्धचालक यानी सेमीकंडक्टर निर्माण के क्षेत्र में एक नए और बेहद महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में उभर रहा है। यह वह क्षेत्र है जिसे आधुनिक तकनीक की असली रीढ़ माना जाता है। वर्ष 2026 में देश की यह महत्वाकांक्षा नीतिगत दस्तावेजों से निकलकर वास्तविक कारखानों और उत्पादन तक पहुंच गई है।

माइक्रोन का पहला कारखाना

भारत में माइक्रोन और टाटा जैसी कंपनियों के सेमीकंडक्टर कारखाने शुरू हो चुके हैं। (प्रतीकात्मक तस्वीर)
भारत में माइक्रोन और टाटा जैसी कंपनियों के सेमीकंडक्टर कारखाने शुरू हो चुके हैं। (प्रतीकात्मक तस्वीर)

इस दिशा में एक बड़ी उपलब्धि अमेरिकी कंपनी माइक्रोन के कारखाने के रूप में सामने आई है। गुजरात के साणंद में स्थित इस कारखाने में 2.75 अरब डॉलर का भारी निवेश किया गया है। यहां वर्ष 2025 के अंत में उत्पादन शुरू हो चुका है, और यह DRAM तथा NAND जैसी मेमोरी चिप्स की पैकेजिंग और परीक्षण का काम करता है।

इस महत्वपूर्ण कारखाने का उद्घाटन 28 फरवरी 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा किया गया था। यह मौजूदा दौर की पहली पूरी तरह चालू सेमीकंडक्टर सुविधा है। खास बात यह है कि माइक्रोन, भारत में विनिर्माण स्थापित करने वाली पहली बड़ी अमेरिकी सेमीकंडक्टर कंपनी भी बन गई है।

टाटा और अन्य कंपनियां

माइक्रोन के अलावा, भारत की अपनी दिग्गज कंपनी टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स भी इस क्षेत्र में सक्रिय रूप से काम कर रही है। असम के जागीरोड में स्थित इसका कारखाना पैकेजिंग और परीक्षण के लिए चालू हो चुका है। यह कारखाना ताइवान की कंपनी पावरचिप के साथ साझेदारी में स्थापित किया गया है और परिपक्व नोड की लॉजिक चिप्स पर काम करता है।

गुजरात के साणंद में एक और उल्लेखनीय कारखाने का उद्घाटन 31 मार्च 2026 को किया गया। यह कारखाना कायन्स सेमीकॉन नामक कंपनी का है, जिसमें कुल 33 अरब रुपये का बड़ा निवेश किया गया है। यह अत्याधुनिक सुविधा प्रतिदिन लगभग 60 लाख चिप्स की परीक्षण और पैकेजिंग करने की प्रभावशाली क्षमता रखती है।

ढोलेरा में पहला फैब्रिकेशन प्लांट

देश के सेमीकंडक्टर सपने का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा गुजरात के ढोलेरा में आकार ले रहा है। यहां टाटा समूह द्वारा भारत का पहला वेफर फैब्रिकेशन प्लांट बनाया जा रहा है, जिसका निर्माण कार्य अब उन्नत चरण में पहुंच चुका है। इस विशाल परियोजना में लगभग 91,000 करोड़ रुपये का भारी निवेश किया जा रहा है।

यह अत्याधुनिक कारखाना 28 नैनोमीटर और उससे बड़े नोड की चिप्स का निर्माण करेगा। पूरी क्षमता से चलने पर यह प्रति माह 50,000 वेफर तक का उत्पादन कर सकेगा। इस कारखाने से पहली सिलिकॉन चिप वर्ष 2026 के अंत तक आने की उम्मीद जताई जा रही है, जो देश के लिए एक बड़ी उपलब्धि होगी।

सरकार का भरपूर समर्थन

इस पूरे बड़े परिवर्तन के पीछे भारत सरकार का मजबूत समर्थन एक अहम भूमिका निभा रहा है। इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन के तहत कुल मिलाकर 76,000 करोड़ रुपये की प्रतिबद्धता जताई गई है। इसमें से वर्ष 2026 की शुरुआत तक लगभग 18,000 करोड़ रुपये की राशि पहले ही वितरित की जा चुकी है।

सरकार की गंभीरता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि इस क्षेत्र को बजट में एक बड़ा हिस्सा दिया गया है। वर्ष 2026-27 के बजट में सेमीकंडक्टर मिशन के लिए 8,000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। यह इस महत्वाकांक्षी कार्यक्रम के शुरू होने के बाद से किसी एक वर्ष में दिया गया सबसे बड़ा आवंटन है।

कई राज्यों में परियोजनाएं

सेमीकंडक्टर निर्माण की यह लहर अब देश के कई अलग-अलग हिस्सों में तेजी से फैल रही है। आधिकारिक जानकारी के अनुसार, 18 मई 2026 तक सात अलग-अलग राज्यों में कुल 13 सेमीकंडक्टर परियोजनाओं को मंजूरी दी जा चुकी है। इनमें एक बड़ा लॉजिक फैब, कई पैकेजिंग इकाइयां और सिलिकॉन कार्बाइड से जुड़ी परियोजनाएं शामिल हैं।

विदेशी दिग्गज कंपनियों की भागीदारी भी इस क्षेत्र में लगातार बढ़ती जा रही है। इसका एक बेहतरीन उदाहरण एचसीएल और फॉक्सकॉन के बीच का संयुक्त उद्यम है। इस परियोजना का शिलान्यास उत्तर प्रदेश के जेवर स्थित यीडा क्षेत्र में किया गया है। इससे देश में चिप निर्माण की समग्र क्षमता और अधिक मजबूत होने वाली है।

भविष्य के बड़े लक्ष्य

भारत ने अर्धचालक के क्षेत्र में पूरी तरह आत्मनिर्भर बनने के लिए बड़े और स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित किए हैं। देश का इरादा वर्ष 2029 तक अपनी घरेलू चिप मांग का लगभग 70 से 75 प्रतिशत हिस्सा खुद ही पूरा करने का है। यह महत्वपूर्ण लक्ष्य विदेशी आयात पर देश की निर्भरता को काफी कम करने में मददगार साबित होगा।

इतना ही नहीं, भारत की महत्वाकांक्षाएं इससे भी कहीं आगे तक जाती हैं। देश ने वर्ष 2035 तक 3 नैनोमीटर और 2 नैनोमीटर जैसी बेहद अत्याधुनिक तकनीक से चिप्स बनाने की क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखा है। यह उन्नत क्षमता वर्तमान में दुनिया की केवल कुछ ही चुनिंदा कंपनियों के पास मौजूद है।

कुल मिलाकर, भारत इस समय अर्धचालक निर्माण के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक बदलाव के दौर से गुजर रहा है। सरकारी नीतियों, भारी निवेश और वैश्विक कंपनियों की सक्रिय भागीदारी के संयुक्त प्रयासों से यह सपना अब धीरे-धीरे हकीकत बनता जा रहा है। आने वाले वर्षों में भारत निश्चित रूप से इस क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण वैश्विक खिलाड़ी बनकर उभरेगा।

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