अर्जुन मेहताVIEW PROFILE →
एआई का ईंधन: कैसे भारत में डेटा सेंटर का महाचक्र दौड़ पड़ा है
हर एआई सवाल के पीछे कहीं न कहीं भारी कंप्यूटिंग शक्ति चाहिए। भारत अब डेटा सेंटर के 'महाचक्र' में है, जहाँ क्षमता 2026 में करीब 2 गीगावाट से बढ़कर 2030 तक चौगुनी होने की राह पर है, दिग्गज कंपनियाँ अरबों डॉलर लगा रही हैं और असली परीक्षा बिजली और क्रियान्वयन की है।
जब भी आप किसी एआई चैटबॉट से सवाल पूछते हैं या क्लाउड पर कोई फ़ाइल सहेजते हैं, तो कहीं न कहीं एक विशाल डेटा सेंटर उस अनुरोध को संभाल रहा होता है। एआई की इसी बढ़ती भूख ने भारत को डेटा सेंटर के एक ऐसे दौर में धकेल दिया है जिसे विशेषज्ञ 'महाचक्र' कह रहे हैं। देश की परिचालन क्षमता 2026 में करीब दो गीगावाट तक पहुँचने का अनुमान है और लगभग तीस अरब डॉलर के निवेश के बल पर यह 2030 तक कई गुना बढ़ने की राह पर है।
एआई-इंफ्रास्ट्रक्चर का महाचक्र
इस उछाल की असली वजह कृत्रिम बुद्धिमत्ता है, जिसे प्रशिक्षित और संचालित करने के लिए हज़ारों शक्तिशाली जीपीयू की ज़रूरत पड़ती है। उदाहरण के तौर पर, योट्टा जैसी कंपनियों ने सोलह हज़ार एनविडिया एच100 चिप के क्लस्टर तैनात किए हैं, जिससे हर रैक की बिजली खपत चालीस से सौ किलोवाट तक पहुँच गई है। मार्च 2025 से अप्रैल 2026 के बीच देशभर में लगभग तीस बड़ी परियोजनाओं की घोषणा हुई, जो मिलकर करीब साढ़े तीन गीगावाट की नियोजित क्षमता जोड़ती हैं।
दिग्गजों का दांव
इस दौड़ में दुनिया की सबसे बड़ी तकनीकी कंपनियाँ भारी दांव लगा रही हैं। माइक्रोसॉफ्ट ने करीब साढ़े सत्रह अरब डॉलर, अमेज़न ने पंद्रह अरब और गूगल ने भी पंद्रह अरब डॉलर की प्रतिबद्धता जताई है, और क्षेत्र में कुल निवेश प्रतिबद्धताएँ सौ अरब डॉलर के पार जा चुकी हैं। घरेलू मोर्चे पर भी अडानी समूह जैसी कंपनियाँ नवीकरणीय ऊर्जा से चलने वाले विशाल एआई डेटा केंद्रों में अरबों डॉलर लगाने की योजना बना रही हैं।
कहाँ बन रहे हैं ये केंद्र
भौगोलिक रूप से यह विकास कुछ केंद्रों के इर्द-गिर्द सिमटा हुआ है। मुंबई अकेले करीब उनचास प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ सबसे आगे है, क्योंकि यहाँ समुद्री केबल कनेक्टिविटी और बुनियादी ढाँचा मज़बूत है, जबकि चेन्नई अठारह प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर है। इसके अलावा आंध्र प्रदेश और तेलंगाना मिलकर दो गीगावाट से अधिक क्षमता की ओर बढ़ रहे हैं, जहाँ विशाखापत्तनम और हैदराबाद में एआई-केंद्रित विशाल कैंपस बन रहे हैं।
बिजली की सबसे बड़ी चुनौती
हालाँकि इस पूरी कहानी की सबसे बड़ी अड़चन बिजली है, क्योंकि डेटा सेंटर बेहद ऊर्जा-भूखे होते हैं। इसीलिए इनका भविष्य भारत के 2030 तक पाँच सौ गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा के लक्ष्य से गहराई से जुड़ गया है। कई कंपनियाँ सीधे बिजली खरीद समझौतों के ज़रिए अपने कैंपस को सौर और पवन ऊर्जा से जोड़ने की कोशिश कर रही हैं, ताकि यह विस्तार टिकाऊ रहे और ग्रिड पर अनावश्यक दबाव न पड़े।
घोषणा नहीं, क्रियान्वयन तय करेगा
आँकड़े और घोषणाएँ चाहे जितनी चमकदार हों, असली परीक्षा ज़मीन पर क्रियान्वयन की है। पर्याप्त बिजली, ठंडक के लिए पानी, उपयुक्त ज़मीन और कुशल कर्मचारी, इन सबका मेल ही तय करेगा कि ये विशाल योजनाएँ समय पर पूरी होती हैं या कागज़ पर ही रह जाती हैं। अगर भारत इन चुनौतियों को पार कर लेता है, तो वह न सिर्फ़ अपनी डिजिटल ज़रूरतें पूरी करेगा, बल्कि वैश्विक एआई कंप्यूटिंग के नक्शे पर एक अहम केंद्र के रूप में उभर सकता है।






