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भारत का एआई और सेमीकंडक्टर मिशन: 45,000 जीपीयू और अरबों के निवेश से तकनीकी आत्मनिर्भरता की ओर

tech2026-08-20 · 3 min read · 0 reads

भारत कृत्रिम बुद्धिमत्ता और सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है। इंडियाएआई मिशन के तहत 45,000 से अधिक जीपीयू और स्वदेशी मॉडल विकसित किए जा रहे हैं, जबकि सेमीकंडक्टर मिशन में अरबों रुपये का निवेश हो रहा है।

भारत कृत्रिम बुद्धिमत्ता और सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है। सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं के तहत देश अब न केवल इन तकनीकों को अपना रहा है, बल्कि इन्हें स्वदेशी रूप से विकसित करने पर भी जोर दे रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य तकनीकी क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करना है।

इंडियाएआई मिशन की मजबूत नींव

इस दिशा में सबसे अहम पहल इंडियाएआई मिशन है, जिसके लिए 10,372 करोड़ रुपये का बजट निर्धारित किया गया है। इस मिशन का मुख्य उद्देश्य देश में एक मजबूत और स्वदेशी एआई पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करना है, ताकि भारत इस क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर अपनी अलग पहचान बना सके।

इस मिशन की सबसे बड़ी ताकत इसकी कंप्यूटिंग क्षमता है। जून 2026 तक देश में 45,000 से अधिक जीपीयू यानी ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित की जा चुकी हैं। ये शक्तिशाली प्रोसेसर एआई मॉडलों को प्रशिक्षित करने के लिए आवश्यक विशाल कंप्यूटिंग शक्ति प्रदान करते हैं।

इन संसाधनों का उपयोग भी तेजी से बढ़ रहा है। अगस्त तक कुल 237 परियोजनाओं ने रियायती दरों पर इन कंप्यूटिंग संसाधनों का लाभ उठाया। इस दौरान कुल 93.18 लाख जीपीयू घंटे का उपयोग किया गया, जो यह दर्शाता है कि देश में एआई अनुसंधान की गतिविधियाँ किस तेजी से बढ़ रही हैं।

स्वदेशी मॉडल और डेटा

भारत अपने खुद के एआई मॉडल विकसित करने पर विशेष ध्यान दे रहा है। सरकार ने कुल 506 आवेदनों में से 20 स्वदेशी फाउंडेशन मॉडल प्रस्तावों का चयन किया है। इनमें 12 बड़े मल्टीमॉडल मॉडल और 8 छोटे भाषा मॉडल शामिल हैं, जो विभिन्न भारतीय आवश्यकताओं के अनुरूप बनाए जाएंगे।

डेटा की उपलब्धता भी एआई विकास के लिए बेहद जरूरी है। इसके लिए बनाए गए एआई कोश प्लेटफॉर्म पर 14,000 से अधिक डेटासेट और 331 एआई मॉडल उपलब्ध हैं। इसके साथ ही, इस मिशन के तहत अब तक 62 प्रोटोटाइप विकसित किए गए हैं और 20 एआई समाधान सार्वजनिक क्षेत्र में तैनात किए जा चुके हैं।

सेमीकंडक्टर मिशन को नई गति

भारत सेमीकंडक्टर मिशन के तहत छह राज्यों में 12 परियोजनाओं को मंजूरी दे चुका है। (प्रतीकात्मक तस्वीर)
भारत सेमीकंडक्टर मिशन के तहत छह राज्यों में 12 परियोजनाओं को मंजूरी दे चुका है। (प्रतीकात्मक तस्वीर)

एआई के साथ-साथ भारत सेमीकंडक्टर यानी चिप निर्माण के क्षेत्र में भी बड़ी छलांग लगा रहा है। सरकार ने सेमीकॉन 2.0 कार्यक्रम के लिए 1,27,500 करोड़ रुपये का आवंटन किया है। यह पहले के सेमीकॉन 1.0 कार्यक्रम से कहीं बड़ा है, जिसके लिए 76,000 करोड़ रुपये निर्धारित किए गए थे।

इस मिशन के तहत अब तक छह राज्यों में कुल 12 परियोजनाओं को मंजूरी दी जा चुकी है। इन परियोजनाओं में लगभग 1.64 लाख करोड़ रुपये के निवेश की प्रतिबद्धता जताई गई है। उल्लेखनीय है कि इनमें से तीन सुविधाएँ पहले से ही व्यावसायिक उत्पादन के चरण में पहुँच चुकी हैं।

चिप डिजाइन के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई है। देश के 320 शैक्षणिक संस्थानों में डिजाइन के आधुनिक उपकरण उपलब्ध कराए गए हैं और 68,000 से अधिक छात्रों को प्रशिक्षित किया गया है। अप्रैल 2026 तक 75 संस्थानों से कुल 211 चिप तैयार किए जा चुके हैं, जो एक बड़ी उपलब्धि है।

वैश्विक पहचान और निवेश

इन प्रयासों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सराहा जा रहा है। स्टैनफोर्ड की ग्लोबल एआई वाइब्रेंसी रिपोर्ट 2025 में भारत को दुनिया में तीसरा स्थान दिया गया है। यह उपलब्धि दर्शाती है कि भारत अब एआई के क्षेत्र में एक प्रमुख वैश्विक खिलाड़ी के रूप में तेजी से उभर रहा है।

फरवरी 2026 में नई दिल्ली में आयोजित इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट भी इसका एक बड़ा उदाहरण रहा। इस शिखर सम्मेलन में 100 से अधिक देशों के प्रतिनिधिमंडलों ने भाग लिया और 92 देशों ने एक साझा घोषणापत्र को अपनाया, जिससे भारत की वैश्विक भूमिका और अधिक मजबूत हुई।

निवेश के मोर्चे पर भी भारत को लेकर उम्मीदें बहुत ऊँची हैं। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव के अनुसार, अगले दो वर्षों में देश में 200 अरब डॉलर से अधिक का एआई निवेश आने की संभावना है। उन्होंने यह भी कहा कि इन चुनौतियों से निपटने के लिए केवल नियम नहीं, बल्कि एक तकनीकी-कानूनी दृष्टिकोण आवश्यक है।

आत्मनिर्भरता की ओर कदम

कुल मिलाकर, भारत का यह दोहरा मिशन तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में एक निर्णायक कदम है। एआई और सेमीकंडक्टर, दोनों ही आधुनिक अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं। यदि ये योजनाएँ सफल रहीं, तो भारत न केवल आयात पर अपनी निर्भरता कम करेगा, बल्कि वैश्विक तकनीकी नेतृत्व में भी अहम भूमिका निभाएगा।

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