अर्जुन मेहताVIEW PROFILE →
चिप से लेकर AI मॉडल तक: आत्मनिर्भरता की ओर भारत की दोहरी छलांग
IndiaAI Mission के तहत 45,000 से ज़्यादा GPU और स्वदेशी AI मॉडल, तो दूसरी ओर Semicon के ज़रिये देश में बनती चिप्स। भारत तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में एक साथ दो बड़े मोर्चों पर आगे बढ़ रहा है, पर यह राह चुनौतियों से खाली नहीं।
भारत इस समय तकनीक के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक बदलाव के दौर से गुज़र रहा है। एक ओर देश अपनी कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी AI की बुनियादी संरचना खड़ी कर रहा है, तो दूसरी ओर सेमीकंडक्टर चिप्स के घरेलू निर्माण की नींव रख रहा है। ये दोनों मोर्चे मिलकर एक बड़ी तस्वीर बनाते हैं, जिसका नाम है तकनीकी आत्मनिर्भरता। सवाल अब यह नहीं है कि भारत तकनीक अपनाएगा या नहीं, बल्कि यह कि वह उसे खुद बनाएगा या नहीं।
एआई का घरेलू इंजन

इस बदलाव के केंद्र में है IndiaAI Mission, जिसे लगभग 10,372 करोड़ रुपये के बजट के साथ मंज़ूरी दी गई है। इस मिशन ने जून 2026 तक अपनी साझा कंप्यूटिंग क्षमता को बढ़ाकर 45,000 से अधिक GPU तक पहुँचा दिया है। ये ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट ही आधुनिक AI का असली इंजन हैं, जिनके बिना बड़े मॉडल प्रशिक्षित नहीं किए जा सकते। इतनी बड़ी कंप्यूटिंग शक्ति को एक साझा मंच पर लाना अपने आप में बड़ी उपलब्धि है।
इस बुनियादी ढाँचे का इस्तेमाल भी तेज़ी से बढ़ा है। अगस्त 2026 तक 237 परियोजनाओं ने इस सब्सिडी वाली AI कंप्यूटिंग का लाभ उठाया, जो कुल मिलाकर 93.18 लाख GPU घंटे तक पहुँच गया। इसका मतलब है कि यह क्षमता किसी फाइल में बंद नहीं है, बल्कि सक्रिय रूप से शोध और नवाचार में लग रही है। किफ़ायती कंप्यूटिंग तक पहुँच से छोटे स्टार्टअप और शोधकर्ता भी बड़े खिलाड़ियों के साथ प्रतिस्पर्धा कर पा रहे हैं।
सबसे महत्वपूर्ण पहलू है स्वदेशी मॉडलों पर ज़ोर। सरकार ने 506 आवेदनों में से 20 स्वदेशी फाउंडेशन मॉडल प्रस्तावों का चयन किया है, जिनमें 12 बड़े मल्टीमॉडल मॉडल और 8 छोटे भाषा मॉडल शामिल हैं। इसके साथ ही अगस्त तक 62 प्रोटोटाइप तैयार हुए और 20 AI एप्लिकेशन सार्वजनिक क्षेत्र की संस्थाओं में तैनात किए गए। यानी भारत सिर्फ़ विदेशी मॉडल इस्तेमाल करने के बजाय अपने खुद के मॉडल गढ़ने की राह पर है।
सवाल अब यह नहीं कि भारत तकनीक अपनाएगा या नहीं, बल्कि यह कि वह उसे खुद बनाएगा या नहीं।
चिप से लेकर फैब तक
AI की यह महत्वाकांक्षा तभी सार्थक है जब उसके नीचे मज़बूत हार्डवेयर की नींव हो, और यहीं सेमीकंडक्टर मिशन की भूमिका आती है। Semicon 1.0 के तहत 12 सेमीकंडक्टर परियोजनाओं को मंज़ूरी मिली थी, और इनमें से तीन इकाइयों ने 2026 में व्यावसायिक उत्पादन शुरू भी कर दिया है। नीति के कागज़ों से निकलकर असली उत्पादन तक पहुँचना एक निर्णायक कदम है। भारत में बनी चिप अब सिर्फ़ सपना नहीं, बल्कि हक़ीक़त बनने लगी है।
शोध और विकास के मोर्चे पर भी प्रगति ठोस है। अप्रैल 2026 तक 75 संस्थानों द्वारा 211 चिप्स का टेप-आउट किया जा चुका था, जो डिज़ाइन का अंतिम चरण होता है। इसके अलावा 12 नैनोमीटर सहित विभिन्न तकनीकी स्तरों पर सात चिप्स सफलतापूर्वक निर्मित की गईं। ये आँकड़े दिखाते हैं कि भारत केवल असेंबली नहीं, बल्कि डिज़ाइन और निर्माण की गहरी विशेषज्ञता भी विकसित कर रहा है।
इस नींव को अगले स्तर पर ले जाने के लिए जुलाई 2026 में Semicon 2.0 को मंज़ूरी दी गई, जिसका बजट 1,27,500 करोड़ रुपये है। यह कार्यक्रम छह क्षेत्रों को समेटता है: चिप डिज़ाइन, उपकरण और सामग्री, निर्माण, उन्नत पैकेजिंग, शोध एवं विकास, और कौशल विकास। इसके साथ ही Chips to Startup कार्यक्रम के ज़रिये 68,000 से अधिक छात्रों को प्रशिक्षण मिला और 320 शैक्षणिक संस्थानों में डिज़ाइन टूल तैनात किए गए। भविष्य की पूरी एक पीढ़ी को इसके लिए तैयार किया जा रहा है।
विकास की कीमत
हालाँकि इस चमकदार तस्वीर का एक स्याह पहलू भी है, जो नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। विशाखापत्तनम में गूगल की प्रस्तावित 15 अरब डॉलर की AI और डेटा सेंटर परियोजना का विरोध बढ़ता जा रहा है। इसका कारण है इसका पानी की आपूर्ति और आसपास के वन्यजीवन पर संभावित प्रभाव। यह टकराव दिखाता है कि तकनीकी प्रगति और पर्यावरणीय चिंता के बीच संतुलन कितना नाज़ुक है।
यह मुद्दा एक बड़े सच की ओर इशारा करता है। AI और डेटा सेंटर बेहिसाब मात्रा में बिजली और पानी की खपत करते हैं, और उनकी यह भूख लगातार बढ़ रही है। जैसे-जैसे भारत अपनी डिजिटल बुनियाद खड़ी करेगा, उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि यह विकास स्थानीय समुदायों और प्रकृति की कीमत पर न हो। सतत विकास ही इस पूरी महत्वाकांक्षा की असली परीक्षा है।
इन चुनौतियों के बावजूद आत्मनिर्भरता की दिशा में यह ज़ोर रणनीतिक रूप से बेहद अहम है। एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 62 प्रतिशत उत्तरदाता डिजिटल संप्रभुता को एक रणनीतिक प्राथमिकता मानते हैं और उसमें सक्रिय रूप से निवेश कर रहे हैं। इसके अलावा 90 प्रतिशत भारतीय आईटी लीडर अपने AI बजट बढ़ाने के लिए तैयार हैं। ये आँकड़े बताते हैं कि यह सिर्फ़ सरकारी अभियान नहीं, बल्कि पूरे उद्योग की साझा दिशा है।
आने वाले वर्षों में असली चुनौती इन योजनाओं को धरातल पर उतारने की होगी। कंप्यूटिंग शक्ति, स्वदेशी मॉडल और घरेलू चिप निर्माण, ये तीनों मिलकर एक शक्तिशाली इकोसिस्टम बना सकते हैं, बशर्ते इन्हें सही ढंग से जोड़ा जाए। वैश्विक प्रतिस्पर्धा तीव्र है और तकनीक की दौड़ रुकने वाली नहीं। भारत के पास प्रतिभा और बाज़ार दोनों हैं, अब बात केवल क्रियान्वयन की है।
कुल मिलाकर, भारत की यह दोहरी छलांग एक नए तकनीकी युग की शुरुआत का संकेत देती है। चिप से लेकर AI मॉडल तक, देश उस पूरी श्रृंखला पर पकड़ बनाने की कोशिश कर रहा है जो आधुनिक अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। यदि यह प्रयास सफल रहा, तो भारत तकनीक का केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि निर्माता और नियम-निर्धारक बनकर उभरेगा। यही वह भविष्य है जिसकी नींव आज रखी जा रही है।





